संदेश

क्या संगीत विषय के बिना ही प्रदेश में लागू होगी नई शिक्षा नीति? Dr.Rahesh K Chauhan

चित्र
क्या संगीत विषय के बिना ही प्रदेश में लागू होगी नई शिक्षा नीति?  Dr.Rajesh K Chauhan हिमाचल प्रदेश सरकार आगामी सत्र से नई शिक्षा नीति लागू करने का दावा कर रही  है। इस दिशा में राज्य सरकार शिक्षा विभाग को दिशा-निर्देश पहले ही जारी कर चुकी है।  शिक्षा मंत्री विभाग के आला अधिकारियों के साथ इस संदर्भ में कई बैठकें भी कर चुके हैं। सरकार का दावा है कि यदि सब कुछ तैयार रणनीति के तहत चलता रहा तो नए सत्र से नई शिक्षा नीति प्रदेश में लागू कर दी जाएगी।  भारत सरकार ने 21वीं शताब्दी के भारत की जरूरतों को पूरा करने के लिये भारतीय शिक्षा प्रणाली में बदलाव हेतु जिस नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 को मंज़ूरी दी है अगर उसका क्रियान्वयन सफल तरीके से होता है तो यह नई प्रणाली भारत को विश्व के अग्रणी देशों के समकक्ष ले आएगी। नई शिक्षा नीति, 2020 के तहत 3 साल से 18 साल तक के बच्चों को शिक्षा का अधिकार कानून, 2009 के अंतर्गत रखा गया है। 34 वर्षों पश्चात् आई इस नई शिक्षा नीति का उद्देश्य सभी छात्रों को उच्च शिक्षा प्रदान करना है जिसका लक्ष्य 2025 तक पूर्व-प्राथमिक शिक्षा (3-6 वर्ष की आयु सीमा...

दोबारा लॉकडाउन लगा तो संभलना मुश्किल हो जाएगा

चित्र
दोबारा लॉकडाउन लगा तो संभलना मुश्किल हो जाएगा - डॉ.राजेश के. चौहान गत वर्ष कोरोनावायरस के कारण लगे लॉकडाउन के घाव अभी भी हरे हैं। ज़ख्म इतने गहरे हैं कि मानव जाति सदियों तक इनकी वेदना से कहराती  रहेगी। पिछले वर्ष 21 मार्च के दिन सम्पूर्ण भारत एक दिन के लिए पूरी तरह से बंद कर दिया गया तथा 24 मार्च से 21 दिन का लॉकडाउन केंद्र सरकार द्वारा लगा दिया गया था। केवल आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति में लगे लोगों,  मेडिकल सेवाएं और पुलिस प्रशासन को छोड़कर सब कुछ बंद कर दिया गया था। सड़कें वीरान हो गई थीं। पार्क में इंसानों की जगह आवारा पशु और जंगली जानवर टहलते नज़र आते थे। स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय, जिम, सिनेमाघर, खेल के मैदान सब के सब सुने पड़ गए थे। भारी तादाद में मजदूरों का पलायन वास्तव में भयावह था। 1000 से 2000 किलोमीटर तक का पैदल सफर अत्यधिक दर्दनाक और डरावना था। सूरज की तपन, पीठ में छोटा बच्चा, भूखे-प्यासे,  नंगे पांव मीलों का वह सफर हर किसी के दिल को झकझोर कर रख देता है। आवश्यक वस्तुओं के लिए लगी लंबी कतारें और ऊपर से बेबस पुलिस के डंडे शायद हर किसी के ज़हन में आज भी सजीव होंगे।...

गिरीपार क्षेत्र के हाटी समुदाय की वेदना ~ Dr.Rajesh K Chauhan

चित्र
गिरीपार क्षेत्र के हाटी समुदाय की वेदना Dr.Rajesh K Chauhan - डॉ.राजेश के. चौहान पूर्वजों से विरासत में मिली अमूल्य संस्कृति का संरक्षण और संवर्धन हमारा कर्तव्य है। हमारी सुप्राचीन लोक परंपराएं ही हमें विश्व पटल पर पहचान दिलाती हैं। आधुनिकता की दौड़ में गतिशील आज का समाज धीरे-धीरे पुरातन संस्कृति से दूर होता जा रहा है। ग्रामीण परिवेश में भी शहरी चकाचौंध पसरने लगी है। आज के दौर में गांव के लोगों की बोली/भाषा, पहनावा, रीति-रिवाज़, खान-पान, रहन-सहन और परंपराओं के निर्वहन में पाश्चात्य संस्कृति की झलक स्पष्ट देखी जा सकती है। बावजूद इसके ज़िला सिरमौर का हाटी समुदाय इक्कीसवीं शताब्दी में भी अपनी सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित रखने में सफल रहा है। हिमाचल प्रदेश के ज़िला सिरमौर का गिरीपार क्षेत्र अपनी प्राचीन सांस्कृतिक एवं धार्मिक परंपरा के कारण हमेशा ही चर्चा में रहा है। ज़िला सिरमौर का गिरीपार क्षेत्र तथा उत्तराखंड का जौनसार बावर क्षेत्र 1835 ई. तक तत्कालीन सिरमौर रियासत में शामिल थे। माना जाता है कि इन दोनों क्षेत्रों के निवासी एक ही पूर्वज के वंशज हैं। गिरीपार क्षेत्र के निवासियों को हाटी तथा ज...

भारतीय कला और संस्कृति का सम्मान है नई शिक्षा नीति

चित्र
- डॉ.राजेश के चौहान हमारे  शास्त्र साहित्य, संगीत और कला विहीन मनुष्य को पूंछ तथा सींग रहि त पशु की संज्ञा देते हैं। भारतीय संस्कृति चिरकाल से विश्व पटल पर अपनी विशेष छाप छोड़ती चली आ रही है। एक दौर था जब हमें विश्वगुरु होने का गौरव प्राप्त था। दुर्भाग्यवश विदेशी आक्रमणकारियों और अन्य ताक़तों ने भारत पर बार- बार आक्रमण कर यहां की सुप्राचीन संस्कृति और ज्ञान को नष्ट करने की पुरज़ोर कोशिश की। इस क्रम में हमारे बहुत सारे ग्रंथों का लोप हो गया था या उन्हें नष्ट भ्रष्ट कर दिया गया था। उल्लेखनीय है कि यह प्रक्रिया पूर्व मध्यकाल में महमूद गजनबी के काल से लेकर मध्य काल में दिल्ली और मुग़ल शासकों तक जारी रही। कालान्तर में ब्रिटिश शासकों ने अंग्रेज़ी के माध्यम से तत्कालीन ब्रिटिश भारत को शिक्षित करने का प्रयास अवश्य किया परंतु उनका प्रयास स्वार्थ से भरा हुआ था। क्योंकि वह एक ऐसा वर्ग तैयार करना चाहते थे जो रूप रंग से तो भारतीय हो परंतु मस्तिष्क से ब्रिटिश मानसिकता का प्रतिनिधित्व करता हो। तब से लेकर आज तक कुछ संशोधनों के साथ यह शिक्षा प्रक्रिया चली आ रही है जिसमें आज आमूलचूल परिवर्तनों की आवश्यकत...

नारी के अपमान से ध्वस्त हुआ था सिरमौरी ताल -Dr.Rajesh Chauhan ( History of sirmour )

चित्र
नारी के अपमान से ध्वस्त हुआ था सिरमौरी ताल - डॉ. राजेश के चौहान (स्वतंत्र लेखक) न्यू शिमला हिमाचल के सिर का मुकुट यानी "सिरमौर" ज़िला प्राचीन काल से ही ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा है। रियासत कालीन सिरमौर राजनैतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक रुप से समृद्ध राज्य था। इस रियासत की प्राचीन राजधानी 'सिरमौरी ताल' थी। माना जाता है कि एक नटी के श्राप के कारण सिरमौरी ताल का विध्वंस हो गया था। उसके बाद काफी समय तक राजबन सिरमौर की राजधानी रही जिसे 1219 ई० में राजा उदित प्रकाश द्वारा यमुना और टौंस नदियों के संगम स्थल 'कालसी'  स्थानांतरित कर दिया गया था। 1621 ई० में राजा कर्म प्रकाश ने नाहन नगर की स्थापना कर उसे अपनी राजधानी बनाया। तब से लेकर सन् 1947 ई० तक नाहन ही इस रियासत की राजधानी रही।  नाहन में स्थित शाही महल, रानी का ताल, राजा का ताल, लिंटन मेमोरियल (दिल्ली गेट), नाहन फाऊन्डरी, महिमा पुस्तकालय, नानी का बाग़ तथा चौग़ान आदि ऐतिहासिक धरोहरें आज भी इस शहर के राजसी अतीत का गुणगान करती हैं। सिरमौर रियासत के नामकरण से संबंधित कोई भी लिखित प्रमाण न होने के परिणामस्वरूप अनेक...

मैं मजदूर हूँ... Mein Mazdoor hoon | Dr.Rajesh Chauhan

चित्र
मैं मज़दूर हूँ..... डॉ.राजेश के चौहान मैं मज़दूर हूं, मैं मजबूर हूँ। मैं मज़दूर हूँ, मैं मजबूर हूँ ।। वक़्त ने है रुलाया मुझको, अपनों ने भी सताया है-२ उम्र भर की ख़ूब मेहनत, फिर भी कुछ ना पाया है।। मैं मज़दूर हूं... जितने मुझ पर कर सितम तू, मैं तो चलता जाऊंगा-२ सदियों से पिसता रहा हूं, आज भी मुस्काऊँगा।। मैं मज़दूर हूं... मंदिर, मस्ज़िद, गुरु का द्वारा, नीव मैंने डाली है-२ सबकी झोली भर दी उसने, मेरी फिर भी ख़ाली है।। मैं मज़दूर हूं... पेट भूखा उसमें बच्चा, दूर तक चलती रही। बाद प्रसव के भी तो मैं बस, मीलों ही चलती रही।। मैं मज़दूर हूं... https://youtu.be/CO88PKTMY1Q https://www.facebook.com/a4applenews/videos/694022141141268/ Dr. Rajesh K Chauhan डॉ.राजेश कुमार चौहान (१० दिसंबर १९८४) एक भारतीय लेखक, गायक, रचनाकार और गीतकार हैं। एक परिपक्व फीचर लेखक के रूप में इनकी अलग पहचान है। इनके द्वारा लिखी गई पुस्तक "संगीताभिलाषी" अमेज़न पर सर्वाधिक बिकने वाली पुस्तकों में से एक है। अनेक शोध-पत्र,आलेख और कवर स्टोरी लिख चुके डॉ.राजेश कई गीतों के रचनाकार भी हैं। वतन पे म...

मैं मज़दूर हूँ, बेहद मजबूर हूँ

चित्र
मैं मज़दूर हूँ, बेहद मजबूर हूँ ... -डॉ. राजेश के. चौहान मैं मज़दूर हूँ, बेहद मजबूर हूँ। ये बात आज के परिप्रेक्ष्य में सोलह आना सत्य प्रतीत होती है। कोरोना के कारण उत्पन्न स्थिति में इस देश में सबसे दयनीय स्थिति मज़दूरों की ही बनी हुई है। अपने परिजनों से मीलों दूर लाखों श्रमिक दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हैं। दावे कुछ भी किए जा रहे हों लेकिन वास्तविकता किसी से छिपी नहीं है। 'राष्ट्र निर्माता' शब्द से अलंकृत श्रमिक वर्ग चहुंओर उपेक्षा का ही पात्र बनता दृष्टिगोचर है। उद्योग-धंधे बंद होने के कारण फैक्टरी मालिकों ने जहां अपना पल्ला झाड़ लिया है, वहीं प्रशासन भी इनके लिए ज़्यादा कुछ करने में असफल ही रहा। परिवहन की व्यवस्था न होने के कारण हजारों-लाखों श्रमिक पैदल ही सैकड़ों/हज़ारों किलोमीटर दूर अपने गांव की ओर पलायन करते दिखे। मीलों दूर अपने गांव की यात्रा कई अभागों की अंतिम यात्रा भी बनी। बावजूद इसके भी मजबूरियों का दौर थमता नज़र नहीं आ रहा है। प्रसव पीड़ा के चलते सैंकड़ों किलोमीटर की पैदल यात्रा, बच्चे को जन्म देना और फिर से लम्बी यात्रा पर तपती गर्मी में ठोकरें खाने के लिए निकल ज...