ग्रामोफोन में रिकॉर्ड हिमाचल का पहला स्वर : महाशय काकू राम -डॉ. राजेश चौहान
हिमालय की पर्वतमालाओं में बसे हिमाचल प्रदेश की धरती केवल देवभूमि ही नहीं रही, वह सदियों से लोकजीवन की स्मृतियों, संघर्षों और सुरों की भूमि भी रही है। यहाँ की हवाओं में केवल ठंडक नहीं, लोकगीतों की अनुगूँज भी घुली रहती है। जब सुबह पहाड़ों के पीछे से सूर्य निकलता है, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो किसी अदृश्य गायक ने प्रकृति के कंठ में पहली तान भर दी हो। इसी धरती पर, इसी लोकसंस्कृति की गोद में, एक ऐसा स्वर जन्मा जिसने अपने समय की सीमाओं को तोड़कर हिमाचल के लोकसंगीत को इतिहास के स्थायी पटल पर अंकित कर दिया। उस स्वर का नाम था—महाशय काकू राम।
स्वतंत्रता से पूर्व का समय था। हिमाचल प्रदेश का वर्तमान स्वरूप तब अस्तित्व में नहीं आया था। अनेक छोटे-बड़े क्षेत्र विभिन्न रियासतों के अधीन थे। सोलन जनपद का कंडाघाट क्षेत्र भी उस समय पटियाला रियासत के अंतर्गत आता था, जिसे आगे चलकर पेप्सू राज्य कहा गया। कंडाघाट को उस समय कोहिस्तान के नाम से जाना जाता था। यह क्षेत्र अपनी भौगोलिक कठिनाइयों, संकरी पगडंडियों और ऊँचे-नीचे पहाड़ों के लिए जाना जाता था, पर साथ ही यहाँ की लोकसंस्कृति अत्यंत समृद्ध थी। कंडाघाट में स्थित "चायल व्यू पैलेस" उस युग में केवल एक राजभवन नहीं था बल्कि कला, संगीत और सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र भी था। यहीं से लोक और शास्त्र का संवाद होता था।
इसी कोहिस्तान क्षेत्र के मही नामक गाँव में, एक साधारण किंतु संस्कारवान परिवार में, श्री बली राम कश्यप और माता रामकी देवी के घर एक पुत्र का जन्म हुआ। उसका नाम रखा गया काकू राम। उस समय किसी ने नहीं सोचा था कि यह बालक आगे चलकर लोकसंगीत का ऐसा दीपक बनेगा, जिसकी लौ पीढ़ियों तक बुझने वाली नहीं होगी। मही गाँव का परिवेश सरल था, जीवन श्रमसाध्य था, पर आत्मा में संतोष और सामूहिकता थी। खेतों में काम करते हुए गाए जाने वाले गीत, पर्वों पर गूँजते लोकसुर और विवाहों में बजते ढोल-नगाड़े—यही काकू राम की पहली पाठशाला बने।
काकू राम का बचपन साधारण बच्चों जैसा नहीं था। उन्हें खेलों से अधिक आकर्षण सुरों से था। जहाँ कहीं भी कोई गीत गाता दिखाई देता, ढोल की थाप सुनाई देती या नगाड़े की आवाज़ आती, काकू राम वहीं ठिठक जाते। उनकी आँखें चमक उठतीं और वे एकटक सुनते रहते। यह सुनना मात्र नहीं था, यह आत्मसात करना था। वे धुनों को अपने भीतर उतार लेते थे। धीरे-धीरे उन्होंने अपने चचेरे और मौसेरे भाइयों से गीत सीखने शुरू किए। कोई उन्हें बैठाकर सिखाता नहीं था, वे देखकर, सुनकर और दोहराकर सीखते थे।
उनके घर के पास एक चट्टान थी। वह चट्टान उनके जीवन में केवल पत्थर नहीं रही, वह उनकी साधना-स्थली बन गई। वहीं बैठकर वे घंटों अभ्यास करते। कभी स्वर साधते, कभी ताल पकड़ते, कभी किसी लोकधुन को अपने ढंग से गुनगुनाते। पहाड़ों की नीरवता उनके अभ्यास की साक्षी बनी। धीरे-धीरे उन्हें राग और ताल की समझ होने लगी, बिना किसी औपचारिक शिक्षा के। यह लोकबुद्धि थी, जो अभ्यास से परिपक्व हो रही थी।
समय बीतता गया और काकू राम किशोर से युवा होने लगे। उनकी प्रतिभा अब केवल गाँव तक सीमित नहीं रही। आस-पास के क्षेत्रों में उनके गायन की चर्चा होने लगी। मेलों, विवाहों और अन्य सामाजिक आयोजनों में उन्हें बुलाया जाने लगा। काकू राम की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे परिस्थिति के अनुसार तत्काल गीत रच लेते थे। अवसर जैसा होता, भाव वैसा ही गीत बन जाता। यह रचना पुस्तकों से नहीं आती थी, यह जीवन से आती थी। वे केवल गायक ही नहीं थे बल्कि हारमोनियम, ढोल और नगाड़ा वादन में भी समान रूप से दक्ष थे। उनके गीतों में शब्द, स्वर और ताल—तीनों का अद्भुत संतुलन होता था।
1914 में ग्रामोफोन में रिकॉर्ड किया पहला गीत
लोकगायकी में निपुण होने के बाद भी काकू राम संतुष्ट नहीं हुए। उन्हें लगा कि यदि लोकसंगीत को दीर्घायु बनाना है, तो शास्त्रीय अनुशासन आवश्यक है। इसी भावना से वे पटियाला पहुँचे और वहाँ के सुप्रसिद्ध गुरु हकीम चाँदन राम चरण के शिष्य बने। गुरु के सान्निध्य में उन्होंने भैरव, कल्याण, कलावती, झिंझोटी, पहाड़ी, खमाज और पीलू जैसे अनेक रागों का विधिवत अभ्यास किया। यह शास्त्रीय शिक्षा उनकी लोकगायकी को और अधिक गहन, गंभीर और मर्यादित बनाती चली गई। अब उनके स्वर में लोक की सहजता के साथ शास्त्र की गरिमा भी समाहित हो गई थी।
वह समय यातायात के साधनों की दृष्टि से अत्यंत कठिन था। सड़कें संकरी थीं, वाहन बहुत कम थे। पहाड़ों से मैदानों तक पहुँचना साहस का कार्य था। ऐसे समय में, वर्ष 1914 में, मात्र अठारह वर्ष की आयु में काकू राम ने कलकत्ता की प्रसिद्ध ग्रामोफोन कंपनी एच.एम.वी. से अपना पहला गीत “बेलुआ बेलुआ बेलुआ हो” रिकॉर्ड कराया। यह केवल एक गीत का रिकॉर्ड होना नहीं था, यह हिमाचल प्रदेश के लोकसंगीत का इतिहास में दर्ज होना था। उस समय ग्रामोफोन पर गीत रिकॉर्ड होना अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि थी और काकू राम हिमाचल प्रदेश के पहले ऐसे व्यक्ति थे जिनकी आवाज को रिकार्ड किया गया था।
जब यह गीत महाराजा पटियाला श्री भूपेन्द्र सिंह ने अपने महल में सुना, तो वे अत्यंत प्रभावित हुए। उन्होंने तुरंत उस प्रतिभाशाली युवक को अपने दरबार में बुलाया। काकू राम जब महाराजा के समक्ष प्रस्तुत हुए, तो उनकी सादगी और आत्मविश्वास दोनों ने महाराजा को प्रभावित किया। महाराजा ने उन्हें अपने दरबारी गायक का पद प्रदान किया। अब काकू राम केवल एक लोकगायक नहीं रहे, वे रियासत की सांस्कृतिक पहचान बन गए। महल में होने वाले जन्मदिवस, नामकरण और अन्य समारोहों में उनका गायन अनिवार्य हो गया।
काकू राम और महाराजा के संबंध केवल राजा और कलाकार के नहीं थे, उनमें परस्पर सम्मान और स्नेह था। एक प्रसिद्ध घटना का उल्लेख किया जाता है कि एक बार रात्रि में महाराजा ने काकू राम को गायन के लिए बुलाया। कार्यक्रम के पश्चात गायकी की प्रशंसा के बाद महाराजा ने हँसी-मज़ाक में कहा, ’’क्यों पाई काकू राम! ’’क्यों पाई काकू राम!
सुणया ए, तेरा दिमाग आजकल बहोत चढ़ गया ए।" इसके प्रतिउत्तर में काकू राम ने मुस्कुराकर उत्तर दिया कि, ’’जिस पर महराजा पटियाला की कृपा हो, उसका दिमाग नहीं चढे़गा तो किसका चढ़ेगा।’’ इस उत्तर पर दोनों ज़ोर से हँस पड़े। महाराजा ने उनके कंधे पर हाथ रखकर टहलना आरंभ कर दिया। यह दृश्य दोनों के आत्मीय संबंधों का प्रमाण था। कहा जाता है कि महाराजा कभी-कभी स्वयं काकू राम के गाँव भी आते थे और खेतों में आयोजित संगीत कार्यक्रमों का आनंद लेते थे। यात्राओं के दौरान भी महाराजा उन्हें साथ रखते थे—एक घोड़े पर महाराजा और दूसरे पर काकू राम।
ग्रामोफोन कंपनी से काकू राम के अनेक गीत रिकॉर्ड हुए—बामणा रा छोरु, छड्डी दे ओ छड्डी दे गद्दनी, बागे लाँवदियाँ मैं तूत—जिनसे उनकी ख्याति अन्य रियासतों तक फैल गई। महासू, बुशहर, क्योंथल, बघाट, बाघल, कहलूर और हिंडूर जैसी रियासतों में उन्हें विशेष सम्मान के साथ बुलाया जाने लगा। जहाँ भी वे गाते, वहाँ लोकजीवन की आत्मा जाग उठती।
काकू राम केवल कलाकार नहीं थे, वे सामाजिक चेतना से भी गहराई से जुड़े थे। वे आर्य समाज के सक्रिय सदस्य थे और जातिवाद तथा छुआछूत जैसी कुरीतियों के प्रबल विरोधी थे। जहाँ कहीं भी समाज को तोड़ने वाली बातें देखते, वे निर्भीक होकर लोगों को समझाते। कुछ लोगों ने उनकी शिकायत महाराजा से की, परंतु महाराजा ने सच्चाई को समझते हुए उन शिकायतों को अस्वीकार कर दिया।
वर्ष 1928 में काकू राम का विवाह शिमला के आर्य समाजी परिवार की सुपुत्री श्रीमती शांति देवी से हुआ। शांति देवी शिक्षित, धर्मपरायण, जागरूक और समाजसेवी महिला थीं। वे आर्य कन्या पाठशाला, लोअर बाज़ार, शिमला से शिक्षित थीं। विवाह के बाद भी उन्होंने आर्य समाज के प्रचार-प्रसार में सक्रिय भूमिका निभाई। स्वतंत्रता संग्राम के समय वे कांग्रेस पार्टी से जुड़ीं और महिलाओं को आंदोलन में भाग लेने के लिए प्रेरित किया। वे महिला पंच रहीं और कंडाघाट में प्रथम महिला मंडल की स्थापना की। संगीत के क्षेत्र में वे कुशल गायिका, आर्य समाज की भजनोपदेशिका और आकाशवाणी शिमला की प्रसिद्ध लोकगायिका रहीं, जिन्हें श्रोताओं ने स्वर-कोकिला की उपाधि दी।
काकू राम और शांति देवी की आठ संतानें हुईं। उनके बच्चों ने विभिन्न क्षेत्रों में अपनी पहचान बनाई। सबसे बड़े पुत्र विश्वबंधु किशोरावस्था में ही गृहत्याग कर साधुवृत्ति में प्रवृत्त हो गए। पुत्री सरला देवी साहित्य और संगीत में रुचि रखती थीं और उनका विवाह हिमाचल प्रदेश की प्रथम विधानसभा के सदस्य श्री रामदास चौहान से हुआ। सुरेंद्र कुमार कवि, गायक और तबला वादक थे। रविंद्र कुमार ने वनस्पति विभाग में सेवाएँ दीं। वीरेंद्र कुमार कृषि कार्य और कांग्रेस संगठन से जुड़े रहे। ज्ञानेंद्र कुमार संगीत और नाटक की ओर उन्मुख रहे और सांग-नाटक तथा नाटक विभाग से जुड़े। पुत्री निर्मला कश्यप ने माता-पिता के साथ संगीत कार्यक्रमों में भाग लिया और आकाशवाणी शिमला से गायन प्रस्तुतियाँ दीं।
इनके सबसे छोटे पुत्र राजेंद्र कश्यप शिक्षा, साहित्य और समाजसेवा के क्षेत्र में विशेष रूप से सक्रिय रहे। उन्होंने हिंदी में स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त की, लोक सेवा आयोग की परीक्षा उत्तीर्ण की और हिंदी प्रवक्ता तथा प्रधानाचार्य के रूप में सेवाएँ देकर सेवानिवृत्त हुए। उन्होंने अनेक भजन, देशभक्ति गीत और कविताएँ लिखीं तथा अपने पिता की विरासत को संरक्षित किया। उनकी पत्नी श्रीमती सावित्री कश्यप भी कुशल गायिका और समाजसेविका हैं। उनके पुत्र अंशुल कुमार और मंजुल कुमार ने इस सांस्कृतिक परंपरा को आगे बढ़ाया। मंजुल कुमार ने महाशय काकू राम के व्यक्तित्व और कृतित्व पर हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय से शोध कर संगीत जगत में इस विरासत को अकादमिक आधार दिया। मंजुल महाशय काकू राम पर लगभग 4 शोध पत्र भी प्रकाशित करवा चुके हैं। जिनका प्रस्तुतीकरण वो राष्ट्रीय व अन्तराष्ट्रीय सेमिनारों तथा सम्मेलनों में भी कर चुके हैं । मंजुल गायन के साथ संगीत संरचना तथा संगीत निर्देशन का कार्य भी करते हैं।
महाशय काकू राम स्मृति समारोह
महाशय काकू राम केवल अपने जीवनकाल में ही नहीं अपितु अपने देहावसान के उपरांत भी हिमाचल प्रदेश की सांगीतिक चेतना में निरंतर जीवित हैं। यह उनके परिवारजनों, शिष्यों और असंख्य संगीतप्रेमियों की अनथक साधना का परिणाम है कि उनकी स्मृति आज केवल चित्रों, पुस्तकों या ग्रामोफोन रिकॉर्डों तक सीमित नहीं है बल्कि प्रत्येक वर्ष मंच पर सजीव होकर पुनः सांस लेती है। इसी जीवंत परंपरा के अंतर्गत वर्ष 2012 से प्रतिवर्ष 24 जुलाई को कंडाघाट (जिला सोलन) में “महाशय काकू राम स्मृति लोक-सांगीतिक समारोह” का आयोजन निरंतर किया जा रहा है।
यह आयोजन मात्र एक श्रद्धांजलि सभा नहीं बल्कि हिमाचल की लोकसंस्कृति का एक विराट और प्रामाणिक उत्सव बन चुका है। समारोह की रूपरेखा अत्यंत सुसंगठित तथा सांस्कृतिक दृष्टि से समृद्ध होती है। कार्यक्रम का शुभारंभ सरस्वती वंदना से किया जाता है, जिसमें गायन और नृत्य—दोनों के माध्यम से वाणी, विद्या और कला की अधिष्ठात्री देवी को नमन किया जाता है।
इसके पश्चात महाशय काकू राम के जीवन और कृतित्व पर विस्तार से प्रकाश डाला जाता है। उनकी कठोर साधना, संघर्षपूर्ण जीवन, दरबारी प्रतिष्ठा तथा लोकधुनों को सहेजने और जन-जन तक पहुँचाने की उनकी अद्वितीय भूमिका का स्मरण किया जाता है। इसके साथ ही उनके प्रसिद्ध लोकगीतों की प्रस्तुतियाँ दी जाती हैं, जिनमें “बेलुवा बेलुवा बेलुवा हो” जैसे ऐतिहासिक गीतों की गूँज श्रोताओं को अतीत से वर्तमान से जोड़ देती है। इस मंच पर केवल गायन नहीं होता, बल्कि हिमाचल की आत्मा—नृत्य, अभिनय, वाद्य और लोककथा—एक साथ प्रवाहित होने लगती है।
इस स्मृति समारोह की गरिमा इस तथ्य से भली-भांति समझी जा सकती है कि अब तक हिमाचल प्रदेश के अनेक प्रतिष्ठित कलाकार इस मंच को अपनी प्रस्तुतियों से अलंकृत कर चुके हैं। इनमें प्रमुख रूप से हिमाचल गौरव डॉ. कृष्ण लाल सहगल, श्रीमती बसंती देवी, श्री कृष्ण कालिया, जिया लाल ठाकुर, श्री सीता राम शर्मा, डॉ.आशीष चौहान और डॉ.मनोज गंधर्व, भारती शर्मा, कुलदीप चंदेल, कैलाश शर्मा, जतिन चौहान सहित अनेक अन्य सुप्रसिद्ध गायक और गायिकाएँ सम्मिलित हैं। इन सभी कलाकारों ने अपनी सशक्त प्रस्तुतियों के माध्यम से महाशय काकू राम की परंपरा को आगे बढ़ाया है और यह सिद्ध किया है कि यह मंच आज हिमाचल का एक प्रामाणिक लोक-संगीत केंद्र बन चुका है।
महाशय काकू राम के संगीत की आत्मा केवल उनकी गायकी तक सीमित नहीं थी बल्कि उनके साथ संगत करने वाले वाद्य और कलाकार भी उतने ही महत्वपूर्ण थे। उनके प्रमुख संगीतकारों में उनके मौसेरे भाई मास्टर सूरत राम का विशेष स्थान रहा, जो एक महान शहनाई वादक और गायक थे। उन्हें हिमाचल प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री डॉ. यशवंत सिंह परमार द्वारा “कला वसु पुरस्कार” से सम्मानित किया गया था। इसके अतिरिक्त श्री कृपा राम और श्री दौलत राम महाशय काकू राम के साथ मुख्य रूप से तबला वादन करते थे, जिनकी संगत अनेक ग्रामोफोन रिकॉर्डों में आज भी सुनी जा सकती है। कंडाघाट क्षेत्र के श्री गोरखिया राम और मास्टर दुर्गा राम ढोल, नगाड़ा और शहनाई पर उनके स्थायी संगतकार थे। इन सभी कलाकारों की संगति में काकू राम के गीत केवल गाए नहीं जाते थे—वे जीवित हो उठते थे।
आज जब कंडाघाट में महाशय काकू राम स्मृति लोक-सांगीतिक समारोह आयोजित होता है, तो वह केवल अतीत को स्मरण करने का अवसर नहीं होता बल्कि यह इस सत्य का प्रमाण बन जाता है कि महाशय काकू राम केवल एक व्यक्ति नहीं अपितु एक जीवित परंपरा हैं—एक ऐसी परंपरा, जो पीढ़ियों से बहती आ रही है और आने वाली पीढ़ियों के सुरों में भी निरंतर बहती रहेगी।
महाशय काकू राम एक व्यक्ति नहीं बल्कि एक निरंतर बहती परंपरा हैं। संक्षेप में हिमाचल प्रदेश के लोकसंगीत का इतिहास महाशय काकू राम के बिना अधूरा है। वे वह स्वर हैं, जो आज भी पहाड़ों की हवाओं में, मेलों की गूँज में और लोकगीतों की तानों में जीवित है।
“बेलुआ बेलुआ बेलुआ हो”
महाशय काकू राम द्वारा रचित गीत “बेलुआ बेलुआ बेलुआ हो” इतना प्रचलित हुआ कि इसे 1952 में बनी फ़िल्म “आन” में लिया गया। इसके शब्दों और धुन को फ़िल्म की आवश्यकता के अनुसार आंशिक रुप से बदल दिया गया लेकिन मूल धुन काकू राम द्वारा रचित ही रही। इस गीत को लता मंगेशकर द्वारा गाया गया। इस गीत का संगीत निर्देशन भारतीय फ़िल्म संगीत के महान स्तंभ नौशाद अली ने किया था। इस फ़िल्म का निर्माण और निर्देशन सुप्रसिद्ध फ़िल्मकार महबूब ख़ान ने किया था और यह हिन्दी सिनेमा की प्रारंभिक रंगीन (टेक्नीकलर) फिल्मों में से एक मानी जाती है। इस गीत को परदे पर फ़िल्म की नायिका नादिरा पर फ़िल्माया गया है। लोक धुन पर आधारित होने के कारण यह है गीत आज भी जनमानस में अत्यधिक प्रचलित है।
इन्होंने आर्य समाज से संबंधित अनेक भजन भी लिखे और उन्हें स्वरलिपिबद्ध कर एच.एम.वी. से रिकॉर्ड करवाया। इन्होंने स्वामी दयानन्द सरस्वती पर आधारित "जूणी बाजा बेदो रा डंका, ऋषि दयानंद बड़ा बांका" गीत की रचना की थी जिसकी धुन पर कालांतर में हिमाचल प्रदेश का सुप्रसिद्ध लोकगीत " लागा ढोलो रा ढमाका, म्हारा हिमाचलो बोड़ा बांका" गीत बनाया गया।



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