विलुप्त होते पक्षियों का संरक्षण : एक बड़ी चुनौती - Dr. Rajesh K Chauhan
विलुप्त होते पक्षियों का संरक्षण : एक बड़ी चुनौती
हर वर्ष 5 जनवरी को मनाया जाने वाला राष्ट्रीय पक्षी दिवस महज़ एक प्रतीकात्मक आयोजन या औपचारिक रस्म बनकर नहीं रह जाना चाहिए। यह दिन हमें प्रकृति के उस मौन लेकिन गहराते संकट की ओर देखने के लिए विवश करता है, जो बिना शोर किए हमारे चारों ओर फैल रहा है। पक्षियों की घटती संख्या केवल जैव विविधता के क्षरण की कहानी नहीं कहती, बल्कि यह मानव सभ्यता और प्रकृति के बीच टूटते संवाद का सबसे संवेदनशील संकेत है। जब आकाश से पक्षियों का कलरव कम होने लगता है, तब समझ लेना चाहिए कि धरती पर जीवन की धड़कन भी कमजोर पड़ रही है। हिमाचल प्रदेश, जिसे हम गर्व से देवभूमि, शांत पहाड़ों और प्राकृतिक सौंदर्य का मुकुट कहते हैं, आज इस संकट की अग्रिम पंक्ति में खड़ा दिखाई देता है। कभी जिन घाटियों और जंगलों में पक्षियों की चहचहाहट सुबह की पहली आवाज़ होती थी, आज वहाँ सन्नाटा बढ़ता जा रहा है। यह सन्नाटा केवल प्रकृति का नहीं बल्कि हमारी संवेदनहीनता का भी प्रतीक है।
भारत का राष्ट्रीय पक्षी मोर भारतीय सांस्कृतिक चेतना में सौंदर्य, गौरव, उल्लास और समृद्धि का प्रतीक रहा है। मंदिरों की शिल्पकला, लोककथाओं, कृष्ण-भक्ति, लोकगीतों और चित्रकला में मोर की उपस्थिति भारतीय मानस की गहराई को दर्शाती है। हिमाचल प्रदेश के निचले और मध्य पर्वतीय क्षेत्रों—ऊना, हमीरपुर, कांगड़ा, बिलासपुर और सोलन—में आज भी मोर देखे जा सकते हैं। वर्ष 1963 में मोर को राष्ट्रीय पक्षी घोषित किया गया तथा वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत इसे सर्वोच्च कानूनी संरक्षण प्रदान किया गया। किन्तु यह एक कड़वी सच्चाई है कि हम मोर के गौरव का उत्सव तो मनाते हैं, पर उसके साथ-साथ सैकड़ों अन्य पक्षी प्रजातियों की पीड़ा और संघर्ष को अनदेखा कर देते हैं। मोर हिमाचल की पक्षी विरासत का प्रतीकात्मक चेहरा है, लेकिन वह पूरी कहानी नहीं है। यदि मोर सुरक्षित है और अन्य पक्षी संकट में हैं, तो यह संरक्षण की अधूरी और असंतुलित दृष्टि को दर्शाता है।
हिमाचल प्रदेश की भौगोलिक, जलवायु और पारिस्थितिक विविधता इसे पक्षियों के लिए एक स्वाभाविक आश्रय स्थल बनाती है। शिवालिक की तलहटी से लेकर धौलाधार, पीरपंजाल और महान हिमालय की ऊँचाइयों तक फैले इस राज्य में 450 से अधिक पक्षी प्रजातियाँ पाई जाती हैं। इनमें स्थानीय, पर्वतीय, उच्च हिमालयी और प्रवासी पक्षी शामिल हैं। यही कारण है कि हिमाचल को देश के प्रमुख बर्ड हॉटस्पॉट्स में गिना जाता है।
किन्तु यह गौरवशाली पहचान आज गहरे संकट में है। बीते कुछ दशकों में पक्षियों की संख्या में आई निरंतर गिरावट अब केवल आशंका नहीं बल्कि स्थापित तथ्य बन चुकी है। जंगलों की कटाई, जलस्रोतों का सूखना और मानवीय हस्तक्षेप ने पक्षियों के प्राकृतिक आवास को सीमित कर दिया है।
मोनाल, जो हिमाचल प्रदेश का राज्य पक्षी है, केवल अपनी रंगीन पंखुड़ियों और सौंदर्य के लिए नहीं जाना जाता, बल्कि यह राज्य की जैविक, सांस्कृतिक और भावनात्मक पहचान का प्रतीक है। इसके साथ-साथ काली तीतर, चकोर, हिमालयन बुलबुल, ग्रिफॉन गिद्ध, चील, बाज, किंगफिशर, स्नो कॉक और अनेक उच्च हिमालयी प्रजातियाँ हिमाचल के पारिस्थितिक तंत्र को संतुलित बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। विशेष रूप से शिकारी पक्षी मृत पशुओं को साफ कर रोगों के प्रसार को रोकते हैं जबकि कीटभक्षी पक्षी कृषि को कीटनाशकों पर निर्भर होने से बचाते हैं। इस प्रकार पक्षी केवल सौंदर्य नहीं बल्कि प्राकृतिक स्वच्छता कर्मी भी हैं।
प्रवासी पक्षियों की दृष्टि से महाराणा प्रताप सागर (पोंग डैम) का विशेष महत्व है। हर वर्ष सर्दियों में यहाँ एक लाख से अधिक प्रवासी पक्षी साइबेरिया, मध्य एशिया और यूरोप से आते हैं। रामसर साइट घोषित यह आर्द्रभूमि हिमाचल को अंतरराष्ट्रीय मानचित्र पर एक विशिष्ट पहचान देती है। यह स्थल हमें यह भी सिखाता है कि पक्षियों की उड़ानें राजनीतिक सीमाओं से परे होती हैं और उनका संरक्षण एक वैश्विक नैतिक जिम्मेदारी है।
इसके बावजूद वास्तविकता अत्यंत चिंताजनक है। अनेक पक्षी प्रजातियाँ आज विलुप्त या विलुप्तप्राय स्थिति में पहुँच चुकी हैं। गिद्धों की संख्या में आई भयावह गिरावट इसका सबसे मार्मिक उदाहरण है। एक समय हिमाचल के आकाश का अभिन्न हिस्सा रहे गिद्ध आज दुर्लभ दृश्य बन चुके हैं। पशुओं में प्रयुक्त हानिकारक दवाएँ, भोजन की कमी और आवास नष्ट होने के कारण यह संकट और गहराया है।
इसी प्रकार वेस्टर्न ट्रैगोपैन, स्नो कॉक और अन्य उच्च हिमालयी पक्षियों का भविष्य भी अनिश्चित होता जा रहा है। यह केवल प्रजातियों का संकट नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिक तंत्र के ढहने की चेतावनी है। इस संकट के पीछे कारण स्पष्ट हैं और अधिकांशतः मानव-निर्मित हैं। वनों की अंधाधुंध कटाई, सड़कों और जलविद्युत परियोजनाओं का अनियंत्रित विस्तार, रासायनिक कीटनाशकों का अत्यधिक प्रयोग, मोबाइल टावरों और हाई-टेंशन बिजली लाइनों से होने वाली दुर्घटनाएँ—ये सभी विकास के नाम पर प्रकृति पर किए जा रहे प्रयोग हैं।
इसके साथ ही जलवायु परिवर्तन ने हिमाचल की पारंपरिक मौसम प्रणाली को असंतुलित कर दिया है। अनियमित वर्षा, असमय हिमपात और बढ़ता तापमान पक्षियों के भोजन, प्रजनन और प्रवास चक्र को प्रभावित कर रहा है। जो पक्षी समय पर लौटते थे, अब रास्ता भटकने लगे हैं। चिंता का विषय यह भी है कि संरक्षण से जुड़े कानूनों और योजनाओं के बावजूद जमीनी स्तर पर संवेदनशीलता का अभाव बना हुआ है। ग्रामीण क्षेत्रों में घोंसलों का नष्ट होना, जलस्रोतों के आसपास अतिक्रमण और जंगलों पर बढ़ता दबाव आम बात हो गई है। इससे यह स्पष्ट होता है कि पक्षी संरक्षण को आज भी केवल सरकारी जिम्मेदारी माना जा रहा है, जबकि यह वास्तव में सामूहिक सामाजिक दायित्व है।
समाधान हमारे सामने हैं, यदि हम उन्हें अपनाने का संकल्प लें। स्थानीय समुदाय आधारित संरक्षण मॉडल, विद्यालयों में पक्षी अध्ययन और पर्यावरण शिक्षा, पंचायत स्तर पर जलस्रोत संरक्षण, जैविक खेती को प्रोत्साहन, बिजली लाइनों को पक्षी-अनुकूल बनाना और संरक्षित क्षेत्रों की सख्त निगरानी—ये सभी कदम संरक्षण को नई दिशा दे सकते हैं।
पोंग डैम, ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क और रेणुका झील जैसे क्षेत्रों को पक्षी अनुसंधान, ईको-टूरिज्म और जागरूकता केंद्रों के रूप में विकसित करना समय की मांग है।
राष्ट्रीय पक्षी दिवस हिमाचल के लिए उत्सव नहीं, बल्कि आत्मचिंतन की चेतावनी है। यदि आज हमने मोर के साथ-साथ मोनाल, गिद्ध और प्रवासी पक्षियों की रक्षा नहीं की, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें खामोश पहाड़ों और सूने आकाश के लिए याद करेंगी। पक्षियों का कलरव केवल सौंदर्य नहीं, बल्कि जीवन की निरंतरता का प्रमाण है। हिमाचल की आत्मा उसके जंगलों, नदियों और पक्षियों में बसती है और उस आत्मा की रक्षा करना हम सबकी साझा, नैतिक और ऐतिहासिक जिम्मेदारी है।

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