संस्कृति के आईने में शिमला - डॉ. राजेश चौहान ( Dr. Rajesh K Chauhan )

 


संस्कृति के आईने में शिमला

ज़िला शिमला केवल प्राकृतिक सौंदर्य, देवदार के सघन वनों और औपनिवेशिक धरोहरों के कारण ही विख्यात नहीं है, अपितु यहाँ की समृद्ध लोकसंस्कृति एवं मेलों की गौरवशाली परंपरा भी इसे विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान प्रदान करती है। शिमला जनपद के मेले यहाँ के सामाजिक जीवन, धार्मिक आस्था, कृषि संस्कृति, लोककला और पारंपरिक जीवन शैली के जीवंत प्रतीक हैं। पहाड़ों में मेले केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं होते, बल्कि वे सामाजिक मेल-मिलाप, व्यापार, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और देव परंपराओं के संरक्षण का महत्वपूर्ण अवसर भी होते हैं। 

शिमला का सांस्कृतिक स्वरूप की झलक केवल शहर तक सीमित नहीं है अपितु इसके प्रमुख कस्बों रामपुर, रोहड़ू, ठियोग, चौपाल, जुब्बल, कोटखाई, कुमारसैन, मशोबरा, ननखड़ी आदि के ग्रामीण परिवेश में भी मिलती है। यहाँ की संस्कृति प्रकृति के साथ सामंजस्य में विकसित हुई है। पहाड़ों की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों ने यहाँ के लोगों को मेहनती, सरल और सामूहिक जीवन का पक्षधर बनाया है। यही कारण है कि शिमला की संस्कृति में आत्मीयता और अपनापन विशेष रूप से दिखाई देता है।


इतिहास के पन्नों को खंगालें तो वर्षों पहले शिमला क्षेत्र घने जंगलों और छोटे-छोटे गाँवों तक सीमित था। अंग्रेजों ने उन्नीसवीं शताब्दी में इसे अपनी ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाया जिसके बाद यहाँ आधुनिक विकास प्रारंभ हुआ। अंग्रेजों के आगमन से शिमला में यूरोपीय स्थापत्य कला, सामाजिक जीवन शैली और आधुनिक शिक्षा का प्रभाव दिखाई देने लगा। इसके बावजूद शिमला ने अपनी मूल पहाड़ी संस्कृति को कभी नहीं छोड़ा। आज भी यहाँ के गाँवों में लोकपरंपराएँ, देव आस्था और सामूहिक सामाजिक जीवन उसी जीवंतता के साथ दिखाई देते हैं। यही मिश्रण शिमला की संस्कृति को विशिष्ट बनाता है—जहाँ एक ओर ब्रिटिश स्थापत्य है, वहीं दूसरी ओर देव संस्कृति की गहरी जड़ें भी हैं।


शिमला ज़िला की संस्कृति का सबसे महत्वपूर्ण आधार यहाँ की देव परंपरा है। यहाँ के लोग देवी-देवताओं को अपने जीवन का अभिन्न अंग मानते हैं। लगभग हर गाँव का अपना स्थानीय देवता होता है, जिसकी पूजा अत्यंत श्रद्धा के साथ की जाती है। देवताओं की पालकियाँ, ढोल-नगाड़े, करनाल और रणसिंघे शिमला की सांस्कृतिक पहचान हैं। किसी भी शुभ कार्य, उत्सव या मेले में देवताओं की उपस्थिति अनिवार्य मानी जाती है। ग्रामीण समाज में आज भी कई सामाजिक निर्णय देव परंपराओं से प्रभावित होते हैं। रोहड़ू, जुब्बल, ठियोग, चौपाल और कुमारसैन क्षेत्रों में देव संस्कृति की विशेष झलक देखने को मिलती है। यहाँ देव यात्राएँ और देव मिलन धार्मिक आस्था के साथ-साथ सामाजिक एकता का भी प्रतीक हैं।


आस्था और देव पम्परा से जुड़ा भूंडा महायज्ञ भी ज़िला शिमला, विशेषकर रोहड़ू क्षेत्र की एक प्राचीन और दुर्लभ देव परंपरा है। इसका आयोजन कई वर्षों के अंतराल के बाद क्षेत्र की सुख-समृद्धि, शांति और जनकल्याण की कामना से किया जाता है। इस महायज्ञ का प्रमुख आकर्षण ‘बेड़ा रस्म’ है, जिसमें एक व्यक्ति रस्सी के सहारे गहरी खाई को पार करता है। यह अनुष्ठान देव आस्था, साहस और लोकविश्वास का प्रतीक माना जाता है। भूंडा महायज्ञ शिमला की समृद्ध देव संस्कृति और लोक परंपराओं का महत्वपूर्ण अंग है।


मेले हमारी सांस्कृतिक विरासत के परिचायक होते हैं। ज़िला शिमला के हर क्षेत्र में वर्ष भर अनेक मेले आयोजित होते हैं। ये मेले धार्मिक आस्था, लोकविश्वास, सामाजिक एकता, व्यापारिक गतिविधियों तथा सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के महत्वपूर्ण माध्यम रहे हैं। इन मेलों में लोकदेवताओं की पूजा, नाटी नृत्य, लोकसंगीत, पारंपरिक खेल, व्यापारिक गतिविधियाँ तथा सामुदायिक सहभागिता विशेष रूप से देखने को मिलती है। ज़िला शिमला के प्रमुख मेले इस प्रकार से हैं -


लवी मेला 

अंतर्राष्ट्रीय लवी मेला हिमाचल प्रदेश का सबसे महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक मेला माना जाता है। इसका आयोजन प्रतिवर्ष नवंबर माह में रामपुर बुशहर में किया जाता है। इसका इतिहास लगभग तीन सौ वर्षों से भी अधिक पुराना माना जाता है। यह मेला बुशहर रियासत और तिब्बत के मध्य हुए व्यापारिक समझौते की स्मृति में आरम्भ हुआ था।  प्राचीन काल में तिब्बत, किन्नौर, लद्दाख तथा स्पीति से व्यापारी ऊन, पश्मीना, नमक, घोड़े और अन्य वस्तुएँ लेकर रामपुर आते थे। बदले में यहाँ से अनाज, कपड़े और अन्य आवश्यक वस्तुएँ खरीदी जाती थीं। इस प्रकार लवी मेला हिमालयी व्यापार का प्रमुख केंद्र बन गया। 


आज भी लवी मेले में किन्नौरी शॉल, ऊनी वस्त्र, हस्तशिल्प, सूखे मेवे, पारंपरिक आभूषण और स्थानीय उत्पादों की बड़ी बिक्री होती है। सांस्कृतिक संध्याओं में लोकगायक, नृत्य दल तथा विभिन्न राज्यों के कलाकार अपनी प्रस्तुतियाँ देते हैं। यह मेला हिमाचल की सांस्कृतिक विविधता और ऐतिहासिक विरासत का प्रतीक माना जाता है। 


अंतर्राष्ट्रीय समर फेस्टिवल शिमला 

शिमला समर फेस्टिवल ग्रीष्म ऋतु में आयोजित होने वाला हिमाचल प्रदेश का सबसे लोकप्रिय सांस्कृतिक उत्सव है। इसकी शुरुआत वर्ष 1960 में पर्यटन को बढ़ावा देने और स्थानीय संस्कृति को मंच प्रदान करने के उद्देश्य से की गई थी। इसका आयोजन ऐतिहासिक रिज मैदान पर होता है। 

समर फेस्टिवल में लोकनृत्य, लोकसंगीत, शास्त्रीय संगीत, नाटक, फैशन शो, पुष्प प्रदर्शनी, खेल प्रतियोगिताएँ, हस्तशिल्प प्रदर्शनियाँ और विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। देश के प्रसिद्ध कलाकार भी इसमें भाग लेते हैं। यह उत्सव शिमला की पर्यटन अर्थव्यवस्था को नई ऊर्जा प्रदान करता है तथा देश-विदेश के पर्यटकों को हिमाचली संस्कृति से परिचित कराता है। 


रोहड़ू मेला

रोहड़ू मेला पब्बर नदी के तट पर आयोजित होने वाला अत्यंत प्राचीन मेला है। यह बैसाख माह में देवता शिकरू के सम्मान में आयोजित किया जाता है।  इस मेले में आसपास के गाँवों से हजारों लोग पारंपरिक वेशभूषा में भाग लेते हैं। नाटी नृत्य, लोकगीत, सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ और व्यापारिक गतिविधियाँ इसकी प्रमुख विशेषताएँ हैं। ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सामाजिक मेल-जोल को सुदृढ़ करने में इस मेले की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। 


भराड़ा मेला

भराड़ा मेला शिमला के कुमारसैन क्षेत्र के भराड़ा गांव में प्रतिवर्ष ज्येष्ठ मास की प्रथम तिथि को आयोजित होने वाला एक प्राचीन एवं लोकप्रिय धार्मिक उत्सव है। यह मेला स्थानीय आराध्य देवता कोटेश्वर को समर्पित है और क्षेत्र की समृद्ध लोक-सांस्कृतिक परंपराओं का महत्वपूर्ण प्रतीक माना जाता है।

मेले के अवसर पर देवता कोटेश्वर की सुसज्जित पालकी की भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु भाग लेते हैं। पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार धार्मिक अनुष्ठान संपन्न किए जाते हैं तथा श्रद्धालु सामूहिक रूप से प्रसिद्ध हिमाचली नाटी नृत्य प्रस्तुत करते हैं। मेले में स्थानीय व्यंजन, मिठाइयों, हस्तशिल्प वस्तुओं और अन्य सामानों की दुकानें भी सजती हैं, जिससे पूरा क्षेत्र उत्सवमय वातावरण में परिवर्तित हो जाता है। धार्मिक आस्था, लोक संस्कृति और सामाजिक समरसता का यह उत्सव शिमला जनपद की सांस्कृतिक विरासत को सशक्त रूप से अभिव्यक्त करता है।


भोज मेला

भोज मेला शिमला जिले की रोहड़ू तहसील के गुम्मन गांव में आयोजित होने वाला एक महत्वपूर्ण धार्मिक एवं सांस्कृतिक उत्सव है। यह तीन दिवसीय मेला प्रतिवर्ष नवंबर माह में आयोजित किया जाता है और मुख्य रूप से कुल देवता बंशुर के सम्मान में मनाया जाता है। इसके साथ ही भगवान परशुराम और भगवान किलबारू की भी पूजा-अर्चना की जाती है।

मेले के दौरान आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु गुम्मन पहुंचकर देवता का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। देवता की सुसज्जित पालकी का भव्य जुलूस निकाला जाता है, जिसे श्रद्धालु अपने कंधों पर उठाकर श्रद्धा व्यक्त करते हैं। मेले में पारंपरिक नाटी नृत्य, लोक संगीत, झूले तथा विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम विशेष आकर्षण होते हैं। धार्मिक आस्था, लोक संस्कृति और सामुदायिक उत्साह का यह संगम शिमला जनपद की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा को जीवंत रूप में प्रस्तुत करता है।


महासू जातर

शिमला के कोटखाई क्षेत्र में आयोजित होने वाला एक प्रसिद्ध धार्मिक एवं सांस्कृतिक मेला है, जो क्षेत्र के आराध्य देवता महासू देवता को समर्पित है। यह मेला प्रायः बैसाख माह के तीसरे मंगलवार को आयोजित होता है और कई दिनों तक उत्सव का वातावरण बना रहता है। स्थानीय लोगों की मान्यता है कि महासू देवता क्षेत्र के रक्षक हैं तथा लोगों को सुख, समृद्धि और सुरक्षा प्रदान करते हैं।

मेले के दौरान श्रद्धालु महासू देवता के मंदिर में दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं। इस अवसर पर पारंपरिक नाटी और रासा जैसे लोकनृत्य प्रस्तुत किए जाते हैं, जिनसे हिमाचली लोकसंस्कृति की झलक मिलती है। मेले में स्थानीय व्यंजनों, हस्तशिल्प वस्तुओं तथा लोक मनोरंजन का भी विशेष आकर्षण रहता है। धार्मिक आस्था, लोक परंपराओं और सामुदायिक सहभागिता का यह उत्सव शिमला जनपद की सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण प्रतीक है।


सिपी मेला मशोबरा 

शिमला ज़िला के माशोबरा क्षेत्र में स्थित सिपुर गांव का सिपी मेला क्षेत्र के प्रमुख धार्मिक एवं सांस्कृतिक मेलों में से एक है। यह मेला प्रतिवर्ष ज्येष्ठ मास की प्रथम तिथि (मई माह) को सिपी देवता के सम्मान में आयोजित किया जाता है। इस अवसर पर निकटवर्ती देओठी गांव से सिपी देवता की शोभायात्रा सिपुर पहुंचती है, जिसके दर्शन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक एकत्रित होते हैं।

सिपी मेले का विशेष आकर्षण स्थानीय देव-परंपराएं, धार्मिक अनुष्ठान, ठोडा (तीरंदाजी प्रतियोगिताएं), लोक मनोरंजन तथा पारंपरिक बाजार हैं। मेले में जादूगरों, बाजीगरों और कलाबाजों के प्रदर्शन लोगों का खूब मनोरंजन करते हैं। अतीत में कोटि रियासत के राणा इस मेले के मुख्य संरक्षक और अतिथि हुआ करते थे। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यह स्थल अत्यंत पवित्र और रहस्यमयी माना जाता है। श्रद्धालु यहां की भूमि और धूल को भी देवता की संपत्ति समझकर सम्मान देते हैं तथा मंदिर परिसर में रात्रि विश्राम नहीं करते। धार्मिक आस्था, लोक संस्कृति और सामुदायिक सहभागिता का अनूठा संगम प्रस्तुत करने वाला सिपी मेला शिमला की सांस्कृतिक विरासत का एक महत्वपूर्ण अंग है।


धामी का पत्थर मेला 

शिमला से लगभग 30 किलोमीटर दूर स्थित धामी के हलोग गांव में सदियों पुरानी एक अनूठी परंपरा आज भी जीवित है, जिसे पत्थर मेला या पत्थरों का खेल कहा जाता है। यह मेला दीपावली के दूसरे दिन आयोजित किया जाता है और हिमाचल प्रदेश की सबसे विशिष्ट लोक-परंपराओं में गिना जाता है। इस आयोजन में दो निर्धारित समुदायों के लोग आमने-सामने खड़े होकर एक-दूसरे पर पत्थर बरसाते हैं। यह क्रम तब तक चलता है जब तक किसी व्यक्ति को चोट लगकर रक्तस्राव न हो जाए। मान्यता है कि निकले हुए रक्त को माता भद्रकाली के चबूतरे पर अर्पित किया जाता है, जिससे देवी प्रसन्न होती हैं और क्षेत्र में सुख-समृद्धि बनी रहती है। इस अवसर पर धामी राजपरिवार भी पारंपरिक शाही वेशभूषा में उपस्थित होकर धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेता है।

इस मेले से जुड़ी मान्यताओं के अनुसार प्राचीन काल में यहां माता भद्रकाली को नरबलि दी जाती थी। बाद में धामी रियासत की रानी के आदेश पर नरबलि की प्रथा समाप्त कर दी गई और उसके स्थान पर पशुबलि आरंभ हुई। समय के साथ पशुबलि भी बंद हो गई तथा उसकी जगह प्रतीकात्मक रूप से पत्थर खेलने की परंपरा शुरू हुई। स्थानीय लोगों का दावा है कि इस खेल में चोटें अवश्य लगती हैं, किंतु आज तक किसी की मृत्यु नहीं हुई है। मेले के नियम भी अत्यंत स्पष्ट हैं। केवल जठोली, तुनड़ू, धगोई, कटेड़ू और जमोगी समुदायों के निर्धारित सदस्य ही पथराव में भाग ले सकते हैं, जबकि अन्य लोग केवल दर्शक के रूप में उपस्थित रहते हैं। मेले की शुरुआत राजपरिवार द्वारा नरसिंह पूजा से की जाती है और यह परंपरा आज भी स्थानीय आस्था, इतिहास तथा सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण प्रतीक बनी हुई।

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