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अब के सावन प्रलय भारी

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   अब के सावन प्रलय भारी ✍ डॉ.राजेेेश चौहान स्वतंत्र लेखक    कदाचित सावन शब्द सुनते ही हृदय में एक अलबेली उमंग का भाव जग जाता है, उत्साह की तरंगें उठने लगती हैं, जीवमात्र एक सुरीली तान में खो जाता है लेकिन पिछले कुछ अरसे से सावन दरकते पहाड़, उफनते नदी-नालों के साथ प्रकृति से खिलवाड़ कर रहे विकासशील मानव की खोखली परिकल्पना को आईना दिखाने का प्रयास कर रहा है। सावन कुदरत का सिंगार है, स्नेह का भाव है, तीज-त्योहार का चाव है। सावन में सरसता है, हरीतिमा का निखार और प्रेम का प्रसार है। ग्रीष्म ऋतु की तपिश के बाद सावन की झड़ी आरम्भ होते ही हम सबके भीतर उल्लास, उमंग, उत्साह और संगीत मुखर हो जाता है। सर्वत्र हरियाली, उपवन में पड़े झूले, आसमान पर छाए मेघ और खेतों में लहलहाता धान ऐसे लगता है मानो धरती ने धानी चुनरिया ओढ़ ली हो। बर्खा की रिमझिम फुहार में झींगुर की आवाज़, मिट्टी की सोंधी खुशबू में लिपटी गीली हवा में पपीहे की टेर और छम-छम गिरती बूंदें परिवेश में एक अनुपम स्वर और ताल की उत्पत्ति करती हैं। वसुधा के प्रांगण का यह मनोरम नज़ारा देख मन बरबस ही झूम उठता है।  सबसे ...

संगीत को समर्पित व्यक्तित्व - प्रो.नंदलाल गर्ग - Dr. Rajesh K Chauhan

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संगीत को समर्पित व्यक्तित्व - प्रो.नंदलाल गर्ग ✍ डॉ.राजेेेश चौहान स्वतंत्र लेखक    संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार प्राप्त कर प्रोफ़ेसर नंदलाल गर्ग ने हिमाचल के लिए एक और उपलब्धि दर्ज़ की है। 90 वर्षीय प्रो.गर्ग को संगीत विरासत में मिला है। इस उम्र में भी ये अपने कठिन परिश्रम से विरासत में मिली कलानिधि को संजोए रखने में प्रयासरत हैं। इनका जन्म ज़िला शिमला के धामी में हुआ था तत्कालीन पहाड़ी रियासत धामी में हुआ था। ये धामी दरबार के व्यवसायिक कलाकारों के परिवार से संबंध रखते हैं। हिमाचल के धामी घराने का वैशिष्ट्य इनके गायन-वादन में स्पष्टतया दृष्टिगोचर है। इनके पूर्वज पहाड़ी रियासतों के बाहर कला प्रदर्शन करने में विश्वास नहीं रखते थे साथ ही उस समय यातायात के साधनों का अभाव होने के कारण घराने का नाम अधिकतर पहाड़ी रियासतों तक ही सीमित रहा। इनके घराने में कई ख़्याति प्राप्त गायक, सितार वादक, तबला वादक एवं मृदंग वादक हुए। मौलक राम, घूम राम, टी.आर. कलावंत, उमद, कुमद, वज़ीर आदि धामी घराने के प्रसिद्ध कलाकार रहे हैं। इस घराने के टी.आर. कलावंत ने गायन की शिक्षा महान शिक्षा विभूति पं. विष्णु द...

नारी बलिदान से जनित अनुपम कृति है रुक्मणी कुंड - Dr. Rajesh K Chauhan

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नारी बलिदान से जनित अनुपम  कृति है   रुक्मणी कुंड डॉ.राजेेेश चौहान  स्वतंत्र लेखक  हमारे समाज में नारी की भूमिका सदैव पूजनीय एवं गरिमामयी रही है। वह परिवार और समाज की धुरी है - केन्द्र बिन्दु है। एक ओर प्रेम की प्रतिमूर्ति तो दूसरी तरफ़ संहार स्वरुपा भी है। नारी ने एक ओर कुशल गृहणी बनकर परिवार का संचालन किया तो दूसरी ओर आवश्यकता पड़ने पर अपनी शक्तियों का प्रदर्शन भी किया। परहित में उसका योगदान किसी भी सूरत में पुरुषों से कम नहीं है। नारी के त्याग और बलिदान ने भारत के इतिहास को शून्य नहीं होने दिया। उसके रक्त से लिखा इतिहास आज भी हमें वह पन्ने खोल कर दिखाता है जिस पर नारी रक्त के छींटे अभी भी सूखे नहीं है। नारी महान है। वह देवी है। वह महान शक्ति है। हिमाचल प्रदेश के हर गांव, कस्बे में भी हमें महिलाओं के त्याग से सम्बंधित कोई न कोई किस्सा, कहानी या जनश्रुति सुनने मिल जाती है। यहां देवी स्वरुपा नारी से जुड़ी ऐसी अनेक कहानियां-किवदंतियां हैं, जिन्हें सुलझाने में बड़े-बड़े वैज्ञानिक और तीस मार खां भी उलझ कर रह गए। आज ऐसे ही हैरान करने वाले स्थल की बात करते हैं जहां मुझे क...

हिमाचल गौरव डाॅ.कृष्ण लाल सहगल को समर्पित, "बांका मुल्का हिमाचला।" By Dr.Rajesh K Chauhan

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  हिमाचल गौरव डाॅ.कृष्ण लाल सहगल को समर्पित,"बांका मुल्का हिमाचला।" डॉ.राजेेेश चौहान   हिमाचल गौरव, संगीत शिरोमणी, हिमालय शिरोमणी आदि अनेक सम्मानों से विभूषित डाॅ.कृष्ण लाल सहगल को हिमाचली लोक संगीत का भीष्म पितामाह कहें तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। इन्होंने जिस भी गीत को अपनी आवाज़ दी वह प्रसिद्धि के शिखर पर पहुंचा। इनका जन्म 3 अक्टूबर 1949 को पिता गंगाराम और माता राम देवी के घर गांव भुईरा (राजगढ़) ज़िला सिरमौर में हुआ। बाल्यकाल से संगीत के प्रति अपरिमित रुचि होने के कारण ये विद्यालय में आयोजित होने वाली बाल सभाओं में गीत गाया करते थे। बचपन से ही इनकी आवाज़ में इतना माधुर्य था कि इनके गीत सुनकर विद्यालय के अध्यापक जीवन सिंह वर्मा, प्रेम सिंह ठाकुर और हैडमास्टर प्रेमनाथ दस्सन ने इनको पार्श्व गायक कुंदन लाल सहगल के नाम से मेल खाता उपनाम 'सहगल' दे दिया जो इनके नाम के साथ ताउम्र जुड़ा। पारिवारिक कारणों से इन्हें अपनी स्कूल की पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी और पिता के कहने पर अपना पुश्तैनी व्यवसाय अपना लिया। अत्यधिक व्यस्तताओं के बावजूद भी पढ़ाई प्राइवेट छात्र के रुप में ज...

नेताजी सुभाष चंद्र बोस के जीवन चरित्र से प्रेरणा लें युवा - Dr.Rajesh K Chauhan

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नेताजी सुभाष चंद्र बोस के जीवन चरित्र से प्रेरणा लें युवा                                                                                                 डाॅ.राजेश के चौहान, न्यू शिमला "तुम मुझे ख़ून दो मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा" इस नारे से करोड़ों युवाओं के हृदय में व़तनपरस्ती की अग्निशिखा जगाने वाले भारत माता के वीर सपूत सुभाष चंद्र बोस सदैव युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत रहेंगे। हज़ारों खो रहे थे आज़ादी की उस लड़ाई में पर फिर भी ना जज़्बे में कमी थी ना साहस में, मातृभूमि से मोहब्बत के अलिंगन में एक ऐसी सुखद अनुभूति थी, जहां हर दर्द दूर हो जाता और हर ज़ख़्म भी भर जाता था। ऐसा था देश के सच्चे बेटे, आज़ाद हिन्द फ़ौज का नेतृत्व करने वाले, भारत ही नही अपितु विदेशी भूमि से भी भारत की आज़ादी का उदघोष करने वाले, हम सभी के प्रिय नेताजी का विराट व्यक्तित्व। ने...

शान्ति के अग्रदूत थे नेल्सन मंडेला

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शान्ति के अग्रदूत थे नेल्सन मंडेला                        ‌‌‌‌‌‌                                                                                                                                      - डाॅ.राजेश के चौहान एक व्यक्ति जिसके विचारों को 67 वर्षों तक नज़र अंदाज़ कर दरकिनार किया गया, उसे डराया-धमकाया गया, अमानवीय यातनाएं दी गईं, देशद्रोही करार दिया गया लेकिन फिर भी वह अडिग, अविचलित, अनवरत अपने मार्ग पर चलता रहा और एक दिन दक्षिण अफ्रीका का राष्ट्रपति बना और विश्वपटल पर शान्ति का अग्रदूत बनकर उभरा। रंगभेद के खिलाफ उनके द्वारा स्थापित ...

समाज के शिल्पकार की बढ़ती चुनौतियां

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 समाज के शिल्पकार की बढ़ती चुनौतियां - डॉ.राजेश के चौहान प्रत्येक माता-पिता का सपना होता है कि उनका बच्चा बड़ा होकर एक सफल व्यक्ति बने। बच्चे के धरती पर अवतरण से पहले ही माता-पिता उसके भविष्य के निर्माण में जुट जाते हैं। हर एक मां-बाप इसी उधेड़बुन में लगा होता है कि उनका बालक कम उम्र में अधिक से अधिक ज्ञान अर्जित कर बड़ा होकर डॉक्टर, इंजीनियर, वकील या कोई बड़ा अधिकारी  बने। अल्पायु में ही बच्चे को किसी शिक्षण संस्थान या किसी शिक्षक की शरण में भेज दिया जा रहा है। प्रत्येक बच्चे को डॉक्टर, इंजीनियर या बड़ा अधिकारी बनाना तो संभव नहीं है लेकिन हर बालक/बालिका को अच्छा नागरिक बनाना प्रत्येक माता-पिता और शिक्षक का परम् कर्तव्य है।  आधुनिकता की अंधी दौड़ में समाज के वास्तविक शिल्पकार 'शिक्षक' की ज़िम्मेदारी और चुनौतियां बहुत बढ़ गई हैं। जो स्थान अस्पताल में डॉक्टर का है वही स्थान शिक्षण संस्थान में शिक्षक का है। शिक्षक ही शिक्षा और शिष्य के उद्देश्य पूरे करते हैं। इसलिए किसी भी शिक्षा योजना की सफलता या असफलता शिक्षा क्षेत्र के सूत्रधार शिक्षकों की कार्यप्रणाली पर निर्भर करती है। ...